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: जब इस वीर सपुत ने जलियांवाला बाग हत्याकांड के दोषी जनरल डायर को उसके घर में जाकर मौत की सजा सुनाई

Kailash Gupta

Fri, Jul 30, 2021
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बदनावर।भारत की आज़ादी की कहानी लिखने के लिए देश के ऐसे -ऐसे वैसे शूरवीरों ने अपना बलिदान दिया है, जिनकी सिर्फ दास्तान को सुनकर ही हर देशभक्त रोमांचित और नतमस्तक हुए बिना नहीं रहता। बात एक शताब्दी पूर्व 13 अप्रैल 1919 की है जब वैसाखी के दिन पंजाब के तत्कालीन गर्वनर माइकल ओ' ड्वायर ने हजारों बेगुनाहों को घेरकर गोली से भूनवा डाला। ऊधम सिंह इस खौफनाक मंजर (नरसंहार) के प्रत्यक्षदर्शी थे। वे तिलमिला गए और उन्होंने उसी समय जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली। वे अपने मिशन को अंजाम देने के लिए विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा करते हुए सन् 1934 में लंदन पहुँचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। लगभग 21 वर्ष की तपस्या के बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी के काक्सटन हाल लंदन में उन्हें अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने का मौका मिला और उन्होंने डायर को वही भरी सभा में गोलियों भून डाला वे भागें नहीं बल्कि वही अपने आप को पुलिस के हवाले कर दिया। उन्होंने देश दुनिया को बता दिया कि भारतवंशी अपने हत्यारों को छोड़ते नहीं उनके घर में जाकर सजा सुनाते हैं। 4 जून 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया एवं सन् 1940 को आज ही के दिन 31 जुलाई को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई।उक्त जानकारी देते हुए डाक टिकट संग्रहाक ओम पाटोदी ने बताया कि आज उधम सिंह का शहादत दिवस है वहीं आज ही भारत के एक और सच्चे सपूत मुंशी प्रेमचंद की जयंती भी है। 31 जुलाई 1880 को जन्मे मुंशी प्रेमचंद ने 21 वर्षों तक शिक्षा विभाग में नौकरी करने के पश्चात गांधी जी के आह्वान पर सहायक जिला स्कूल निरीक्षक का पद छोड़ दिया और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए उन्होंने अपनी कलम से देश भक्ति की मशाल जलाए रखी। उन्होंने "माधुरी" का संपादन किया एवं स्वयं की पत्रिका "हंस" और "जागरण" का प्रकाशन भी किया उनका लेखन राष्ट्रवादी चिंतन से ओतप्रोत होता था उनके कहानी संग्रह "सोज-ए-वतन" पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था। भारतीय डाक विभाग द्वारा इन दोनों सपूतों के सम्मान में आज के दिन डाक टिकट जारी किए थे। 31 जुलाई 1980 को मुंशी प्रेमचंद पर एक 30 पैसे मूल्य वर्ग का डाक टिकट जारी किया था जिस पर उनके चित्र के साथ उनके हस्ताक्षर भी थे। इसी प्रकार क्रांतिकारी उधम सिंह पर 31 जुलाई 1992 को एक 1 रूपए मूल्य वर्ग का डाक टिकट जारी किया गया था। यह टिकट पाटोदी के संग्रहण में मौजूद है।

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