: आदिवासी महिलाएं ब्लॉक प्रिंट से तैयार कर रही चंदेरी और महेश्वरी साड़ियां, ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर से भी मिले सोशल मीडिया पर ऑर्डर
Kailash Gupta
Sun, Jul 25, 2021
धार । आदिवासी महिलाओं द्वारा बनाई जा रही साड़ियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से ऑर्डर मिलने लगे। मांडू रोड स्थित केंद्र पर धरा उत्पादन समूह की महिलाओं द्वारा कॉटन, चंदेरी और महेश्वरी साड़ियों को ब्लॉक प्रिंट से सजाकर तैयार किया जा रहा है। जिला प्रशासन ने महिलाओं को प्रशिक्षण देकर रोजगार से जोड़ा बनाए और कपड़ों की बिक्री के लिए ऑनलाइन बाजार उपलब्ध कराया और आज समूह की साड़ियां इंस्टाग्राम के माध्यम से हैदराबाद, बैंगलुरू, विशाखापट्टनम, ऊटी, भोपाल, जबलपुर, चंडीगढ़, सिंगापुर के साथ ही आस्ट्रेलिया आदि स्थानों पर ऑन डिमांड बेची जा रही हैं। ट्रेनिंग लेकर सीखी प्रिन्टिंग, अब हर माह कमा रहे सात से आठ हजार रुपए मुख्यालय पर स्थित धरा प्रिंट सेंटर पर काम कर रही दर्जनभर आदिवासी युवतियों को इसी वर्ष 25 जनवरी को 1 माह की ट्रेनिंग दो शिल्पकारो के द्वारा मांडू में दी, युवतियो को उससे पहले इस विधा के बारे में कुछ मालूम नहीं था, परंतु कुछ कर गुजरने की चाहत में इन्हें बहुत जल्दी पारंगत बना दिया। धार कलेक्टर आलोक कुमार सिंह के निर्देश पर सेंटर के गुरुदत्त कांटे के मार्गदर्शन में युवतियों ने ट्रेनिंग ली और फिर पहुंच गई धार के धरा सेंटर जहां पर युवतियों ने ब्लॉक प्रिंट पर अपने हाथों से चंदेरी और महेश्वरी साड़ियां तैयार की जिसके चर्चा ना केवल धार जिले में बल्कि देश के साथ-साथ विदेश में भी हो रही है। अब इन युवतियों के द्वारा तैयार की गई साड़ियों के ऑनलाइन ऑर्डर ऑस्ट्रेलिया और सिंगापुर से भी मिले जिन को तैयार कर अब ऑर्डर डिस्पैच करने की तैयारी की जा रही है। खास बात यह है कि युवतियां आदिवासी बाहुल्य इलाके की और सभी की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी परंतु अब यहां पर काम करने वाली हर लड़की सात से आठ हजार प्रतिमाह कमा रही है। अनलॉक होते ही महिलाएं फिर जुटी साड़ियां बनाने में, हर माह कमा रही सात से आठ हजार रुपए समूह से 12 महिलाएं आत्मनिर्भर होकर मात्र 3 माह की अल्पावधि में ही 7 से 8 हजार रु. प्रतिमाह कमा रही हैं। हालही में समूह को ऑस्ट्रेलिया की डिजाइनर से साड़ियों का ऑर्डर मिला है। सिंगापुर के एक अन्य ऑनलाइन प्लेटफार्म से भी आर्डर के संबंध में बातचीत जारी है। यह केंद्र मार्च में शुरू किया था परंतु लॉकडाउन की वजह से अप्रैल में बंद करना पड़ा। अब जून से फिर शुरू किया है। आत्मनिर्भर बन चुकी सविता और किरण जैसी कई लड़कियां सेंटर से रोजगार पाकर चला रही है अपना घर सविता और किरण दो बहनों की कहानी सुनकर आप हैरान रह जाएंगे क्योंकि सविता और किरण के तीन भाई बहन और परिवार में कुल पांच भाई बहन है। मां पर आश्रित थे, मां की सर्पदंश से मौत हो चुकी। जबकि बड़ा भाई गांव में ही किराने की दुकान चलाता है जिसकी आमदनी से घर चलाना बहुत मुश्किल था परंतु सविता और किरण ने मांडू सेंटर पर ट्रेनिंग लेकर धरा सेंटर पहुंचकर अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया। आज सविता और किरण दोनों बहने मिलाकर 15 हजार रुपए महीना कमा रही और अपने घर का खर्च आसानी से चला रही है। एक बहन फर्स्ट ईयर तक पढ़ी है, तो दूसरी बहन महज 10 वी ही पढ़ पाई। परिवार की स्थिति ठीक नहीं थी और मां का साया भी छिन चुका था, लिहाजा मजदूरी करने के लिए मजबूर दोनों बहने सेंटर पर पहुंच कर एक अच्छी आमदनी के साथ एक अच्छा जीवन यापन करने की और भी आगे बढ़ रही है एक और जहां आदिवासी समाज में विभिन्न प्रकार की कुप्रथा है तो वहीं अब सविता और किरण समाज के लिए नई प्रेरणा बन रही। 3 गांव की महिलाओं को दी जा रही ट्रेनिंग सुलोबेड़ि, पन्नाला, मेहंदी खेड़ी और मांडू की दीदियों द्वारा अपने हाथ से साड़ी, कुर्ते, दुपट्टा, पर्दे व चादर तैयार की जा रही है। स्वयं सहायता समूह के माध्यम से दाबू प्रिंट की कलाकृतियों का प्रशिक्षण देने के लिए 3 गांव की महिलाओं को ट्रेनिंग दी जा रही। कुछ दिन पहले मांडू के महलों में दिल्ली की एक फोटोग्राफर ने इन हस्तकला से बनने वाली साड़ी, कुर्ते, दुपट्टे को पहना कर फोटोशूट किया था। इसमें से सीता दीदी की दाबू प्रिंट की साड़ी पहनी फोटो देश की सबसे बड़ी वॉग इटली डिजिटल एडिशन मैगजीन में फ्रंट पेज पर छपी है। सुलीबेड़ी की सीता दीदी ने बताया मुझे मालूम पड़ा कि मेरा फोटो मैगजीन में छपा है तो काफी खुशी हुई। कलेक्टर आलोक कुमार सिंह की पहल पर हम दाबू प्रिंट के माध्यम से कई कलाकृतियां बनाना सीख चुके हैं। अब इस कलाकृति के माध्यम से मांडू का नाम आगे बढ़ाएंगे।
स्वयं खुद करती है प्रोडक्ट्स की ब्रांडिंग
Tags :
विज्ञापन
विज्ञापन
जरूरी खबरें
विज्ञापन