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: मनुष्य बुरा नहीं होता, उसका कर्म बुरा होता है। हमें अपराधी से नहीं, अपराध से घृणा करनी चाहिए

Kailash Gupta

Thu, Nov 17, 2022
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121 वीं जन्म जयंती वर्ष

दो आंखें बारह आंखे" व्ही. शांताराम की कालजई रचना उस समय विद्यालयों ने बच्चों को मुफ्त दिखाई थी

बदनावर। हिंदी फिल्म निर्माण के में जिन फिल्मकारों का नाम शिद्दत से याद किया जाता है, उनमें एक हैं, शांताराम राजाराम वणकुद्रे (1901-1990)। जिनके नाम मराठी और हिंदी फिल्मों की लम्बी कतार है। सामाजिक सुधार (अपराधी सुधारगृह) को लेकर उन्होंने सन 1957 में एक फिल्म बनाई 'दो ऑंखें बारह हाथ' जो हिंदी फिल्म के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गयी। यह फिल्म उस आशावाद की कहानी है जो बुराई में अच्छाई खोजती है और यह मानकर चलती है कि मनुष्य बुरा नहीं होता, उसका कर्म बुरा होता है. हमें अपराधी से नहीं, अपराध से घृणा करनी चाहिए। उसे समय इस फिल्म को देश के चल चित्रों में विद्यालय के बच्चों के लिए मुफ्त में प्रर्दशित भी किया गया था। भारतीय डाक विभाग द्वारा वी. शांताराम के सम्मान में 17 नवंबर 2001 एक विशेष डाक टिकट 4 रूपए मूल्य वर्ग का जारी किया गया था।

उक्त जानकारी देते हुए डाक टिकट संग्राहक ओम पाटोदी ने बताया कि, वी. शांताराम का जन्म 18 नवंबर 1901 को कोल्हापुर के एक जैन परिवार में हुआ था। आपका हिन्दी व मराठी फिल्मों पर समान अधिकार था।उन्होंने 1927 में अपनी पहली फिल्म नेताजी पालकर को निर्देशित किया। आपके द्वारा हिन्दी व मराठी चित्रपट को कई महत्वपूर्ण फिल्मों से नवाजा है। जिसमें दुनिया न माने (1937),डॉ. कोटणीस की अमर कहानी (1946), अमर भोपाल (1951), झनक झनक पायल बाजे (1955), दो आँखे बारह हाथ (1957), नवरांग (1959), गीत गाया पत्थरों ने (1964), गुनाहों का देवता (1967), पिंजरा (1972), चानी, इय मराठिएचे नगरी और जुंजे जैसी फिल्में शामिल हैं।उनकी फिल्मों की धूम विदेशों में भी रही, चार्ली चैपलिन ने उनकी मराठी फिल्म 'मानूस' के लिए उनकी प्रशंसा की। यह फिल्म उन्हें बहुत पसंद आई थी।

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