Mon 22 Jun 2026

ब्रेकिंग

राजस्थान के गिरोह के 5 आरोपी गिरफ्तार

युवा कांग्रेस कल करेगी धार नगर पालिका कार्यालय का घेराव

जिससे यातायात व्यवस्था परिवर्तित रहेगी

नगर में 26 आवारा कुत्ते पकड़े

महापौर एवं नपा अध्यक्ष पदों के आरक्षण के लिए अधिकारी नियुक्त

सुचना

: बदनावर के शुगर फ्री अमरूद की दिल्ली में काफी मांग

Kailash Gupta

Fri, Oct 14, 2022
Post views : 110

अमरूद की खेती से दोहरा लाभ लिफाफा बनाने के सालभर के कामकाज से महिला बन रही है आत्मनिर्भर

  बदनावर (पुरुषोत्तम शर्मा)। पश्चिमी बदनावर क्षेत्र में वीनएनआर प्रजाति के अमरूद की खेती जोर शोर से हो रही है। इस शुगर फ्री अमरूद की मांग दिल्ली में काफी है। इसे देखते हुए रकबा अब दो गुना हो गया है। इस फसल से रोजगार का एक इको सिस्टम पारिस्थितिकीय तंत्र भी स्थापित हो गया है जिससे कई लोगों को बारह महीने प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है और वे आत्मनिर्भर हो रहे है। क्षेत्र से मजदूरों का पलायन रोकने में भी इसकी महती भूमिका है। तहसील के पश्चिमी क्षेत्र स्थित मुलथान, रूपाखेड़ा, तिलगारा, जाबड़ा, संदला, बखतपुरा, मुंगेला आदि गांवों के किसान कम रकबे में नकदी फसलंे बोकर व्यवसायिक खेती ही अधिक करते है। मटर से लेकर स्ट्राबेरी तक अनार से लेकर एप्पल बेरी तक की खेती इस क्षेत्र के किसान सफलता पूर्वक करते आए है। इन दिनों वीनएनआर प्रजाति का शुगर फ्री अमरूद इस क्षेत्र के किसानों की पहली पसंद बना हुआ है। इसकी मांग दिल्ली में सर्वाधिक है। क्षेत्र की सारी खपत अकेले दिल्ली में हीे हो जाती है गत वर्ष तक 75 हेक्टेयर में यह फसल थी जो इस वर्ष दुगुनी 150 हेक्टेयर हो गई है। पश्चिमी बदनावर के साथ पूर्वी के ढोलाना एवं दक्षिणी क्षेत्र में कोद, बिड़वाल, कड़ौदकला, इंद्रावल, नागदा एवं घटगारा में इसी की उद्यानिकी लगाई गई है। वर्ष भर रोजगार मिलने से आत्मनिर्भर हो रही है महिलाएं गर्म और शुष्क भूमि मंे अच्छा उत्पादन होने से कम भूमि वाले कृषक उद्यानिकी की और अधिक रूख कर रहे है। एक बार फसल लगाने के बाद दस से 12 वर्षो तक उत्पादन होता है। साथ ही व्यवसाय का एक पूरा इको सिस्टम जुड़ जाता है। उद्यानिकी खेती में अमरूद की फसल प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर के सपने को भी मूर्तरूप देती है। क्योंकि किसान के साथ मजदूर, रोड़ लाईन, आढ़तिए, खेरची विक्रेताओं का एक तंत्र बन जाता है। वीनएनआर प्रजाति के फलों को सनबर्निंग (धूप और मौसम) से बचाव के लिए इस पर बैगिंग किया जाता है। एक पौधे में करीब 50 से 60 फल लगते है और एक बीघा में करीब 350 पौधे लगाए जाते है। अमरूद में वर्ष में दो बार बैगिंग की जाती है। पहले अगस्त माह में जब फल नींबू के आकार का होता है तथा दूसरी मर्तबा नवबंर और दिसबंर माह में। इसके लिए कागज, पोलीथीन और फोम का एक लिफाफा तैयार किया जाता है। किसान टनों से ट्रक भरकर गुजरात से रददी अखबार मंगवाते है इसके अलावा स्थानीय स्तर पर इसकी खरीदी करते है। फिर उन्हें मजदूरों और घरेलू कामगार महिलाओं को बैगिंग तैयार करने हेतु वितरित करते है। महिलाएं घर मंे रहकर ही 20 से 25 रूपए प्रति किलो के हिसाब से ये बैग बनाती है। घरेलू कामकाज के अलावा प्रत्येक महिला आठ से दस किलो तक पेपर बेग बना देती है। पश्चिमी बदनावर में इन दिनों बड़ी संख्या में महिलाएं घर बैठे ही इस काम को कर के रोजगार प्राप्त कर आत्म निर्भर हो रही है। रकबा बढ़ने से अधिकांश महिलाओं को वर्ष भर बैगिंग बनाने का रोजगार घर बैठे प्राप्त हो रहा है।   थाईलेंड के अमरूद भारत में विकसित हुए उद्यानिकी में नवाचार के लिए समीपवर्ती रतलाम जिले के तितरी और मथुरी गांव सुप्रसिद्ध है। मथुरी के उन्नत कृषक थाईलैंड भ्रमण पर गए थे तब उन्होंने थाईलैंड मंे एक बड़ा अमरूद खाया जिसमें बीज कम और मिठास अधिक थी। तब इसे अपने क्षेत्र में उगाने की सोची। भारत मंे वीएनआर भीही हार्टिकल्चर संस्थान ने इसे विकसित किया। उसके बाद यह महाराष्ट्र, गुजरात, मप्र मंे उद्यानिकी किसानों की पहली पसंद बन गया। कीट और वातावरण नियंत्रण हेतु डिवाईस भी विकसित किए गए। इसका एक पौधा 30 से 50 रूपए तक आता है। दो बाई दो मीटर की दूरी पर लगाया जाता हैै। डेढ़ वर्ष बाद ही फल लगने शुरू हो जाते है। इसके फलों पर सनबर्निंग, पक्षियों से बचाने और गुणवता बरकरार रखने के लिए बैगिंग की जाती है। सामान्य अमरूद की तुलना मंे यह काफी बड़ा, ज्यादा मीठा, शुगर फ्री और अधिक दिनों तक गुणवत्ता बरकरार रखने में सक्षम होता है। दिल्ली मंडी में थोक भाव में 50 से 70 रूपए प्रति किलो तक बिक जाता है।

Tags :

विज्ञापन

विज्ञापन

जरूरी खबरें

विज्ञापन